मूर्ख दिवस यानी मूर्ख दिन जब हम मूरखता के रंग एक-दूसरे पर छिड़क कर साथ हंसते हैं। जो मूर्ख बनता है वह भी, और जौ बनाता है वह भी। पर क्यों आमतौर पर मूर्ख कहलानऐ से लोग बचते हैं? दरअसल, यह लोगों की अपनी सोच व 'नजरिये का परिणाम है। वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. विंपुल रस्टोगी कहते हैं, 'मूर्खता को अज्ञानता से जोड़ा जाता है, और इसे अक्सर ज्यादा सूचना संग्रह या शिक्षा प्राप्ति से जोड़ा जाता है, पर ज्ञान को हमें व्यापक 'परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए। वे ज्ञानी हो सकते हैं, जिन्हें उचित-अनुचित का बेहतर ज्ञान होता है, पर कहीं किसी बिंदु पर उनमें भी कमियां होंगी और इसमें कछ गलत नहीं।' डॉक्टर विपुल के अनुसार, आपके ज्ञान की सबसे बड़ी पहचान होगी कि आप स्वयं की अज्ञानता को लेकर कितने सजग हैं और् उसे दूर करने को लेकर सक्रियं भी।
संपूर्णता में देखने की ज़रूरत : बेहतर हो कि हम ज्ञान को स्रंपूर्णता में समझें, जहां आईक्यू से इतर जीवन को समझने का ज्ञान शामिल हो। उन प्रोफेसर की कहानी तो संभवतः सभी ने सुनी होगी, जो एक बार अकेले नौका भ्रमण पर निकले। नाव खेने वाले से बातचीत शुरू की।
उन्होंने केवट से पूछा कि क्या वह संस्कृत या अंग्रेजी जानता है, क्या वह व्याकरण की समझ रखता है, क्या वह बारीकियां समझ पाता है आदि।
नाविक हर बात का नहीं में जवाब देता रहा।उसने कहा कि मुझे कभी स्कूल 🏫 जाने का मौका नहीं मिला ।
इस पर प्रोफेसर ने उसके समूचे जीवन को व्यर्थ बता दिया। तभी अचानक नाव एक भंवर में फंस गई। प्रोफेसर चीखने लगे, भय से कांपने लगे। नाविक ने बड़ी विनग्रताके साथ पूछा, 'साहब तैरना आता है? 'नहीं भाई, नहीं आंता', प्रोफेसर ने कहा। इस पर नाविंक ने कहा, 'तंब तो यह सब कुछ जानना व्यर्थ है। आप खुद की रक्षा ही नहीं कर सकते।' प्रोफेसर साहब के मुंह से दहशत के मारे आवाज नहीं निकल रही थी। पर नाविक ने कुछ ही देर में अपनी कुशलता से नाव को भंवर से निकालकर खुद के साथ-साथ उनकी जिंदगी भी बचाली। प्रोफेसर साहब को इससे जीवन की एक बड़ीं सीख भी मिल गयी।
खुद की मूर्खता को समझना ज्ञान : ज्ञान का सबसे कीमती पहलू है यह जानना कि आप क्या नहीं जानते। एथेंस में जब सुकरात ने यह घोषणा की कि वह सबसे अधिक ज्ञानी है तो लोगों ने उनको चुनौती दी कि वह साबित करें कि वे कैसे सबसे अधिक ज्ञानी हैं। सुकरात का सीधा जवाब था किवह इसलिए सबसे अधिक जानी है, क्योंकि जह जानते हैं कि वह क्या नहीं जानते। एक तरह सै ज्ञानी का अर्थ है खुद की मूर्खता, अज्ञानता के बारे में पता होना। संत कबीर ने भी अपने भीतर ज झांकने की नसीहत दीं है। यह दीहा,प्रचलित है, 'बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय, जौ दिल खोजा आपना, मुझसा बुरा न होय।' वास्तथ मैं बाहर जिसे आप बुरा कह रहे हैं, तो एक नजर खुद की ओर भी डाल लें। आप पाएंगे आपके भीतर मूर्खता यानी जिसे अज्ञानता कहते हैं 'मौजूद है।
स्थायी छवि बनाने से बचें: गौर करें कि हमारे पास जो ज्ञान है, वह अज्ञान भी हो सकता है। सिर्फ कुछ परिस्थितियों में काम आने वाला भी हो सकता है, वास्तविक जीवन से बिलकुल अलग और अप्रासंगिक भी हो सकता है। वह वास्तब में ज्ञान न होकर बस जानकारियों का पुलिंदा मात्र भी हो सकता है। बेहतर हो कि अपनी तथाकथित बुद्धिमानी पर गर्व न किया जाए और न ही अपनी तथाकथित मूर्खता पर शर्मिन्दा हुआ जाए। अपनी अज्ञानता या बुद्धिमान होने को लेकर कोई स्थायी छवि न बनाई जाए तो , बड़ी अच्छी बात होगी। स्थायी छवि यानी किसी को पूरा मूर्ख मान लेना तो किसी को महाज्ञानी। इससे हम बार-बार आहत होने और दूसरों को आहत करने से भी बच जायगे।
लोगों के प्रति हमारी प्रतिक्रियां, उनके व्यवहार के आधार पर नहीं, बल्कि हमारे व्यक्तित्थ के आधार पर होनी आहिए। हम जिस तरह से सौंचते हैं या पेश आते हैं, वह दूसरे व्यक्तियों के लिए नहीं होता। वंह पहले हमारे लिए होता है, क्योंकि सबसे पहले हमें ही इसका अनुभव होगा।हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि अगर हम दूसरों को नियंत्रण में कर लेंगे तो उनके बदलने से हमारा मन भी हमारे वश में आ जाएगा। ऐसा करने के बजाय हमें अपनी मनोस्थिति की जिम्मेदारी लेनी है। हमें यह चुनाव स्वयं करना होगा कि हम क्या सोचते, महसूस करते या बनना चाहते हैं। हमने सदैव दूसरों को प्रसन्न करने की चेश्ठा की है क्योंकि हमें लगता है कि जब वे प्रसन्न होंगे तो हमें भी प्रसन्नता मिलेगी।जब भी हम दूसरों के लिए कुछ करने जा रहे हों लो हमें पहले यह बात समझ लेनी चाहिए कि हम ऐसा इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि ये हमारे लिए मायने रखते हैं और हम इसे अपने लिए कर रहे हैं।
तभी हम प्रसन्न हो सकेंगे।
यदि हम अपने मन को समस्याओं से परे ले जाने के लिए टीवी देखने, खरीदारी करने जैसे विकल्पों का प्रयोग करते हैं तो ये उपाय पीड़ा से स्वयं को कुछ समय के लिए दूर रखने के अस्थायी साधन हैं। यह प्रसन्नता नहीं है, क्योंकि यहां किसी तरह का लाभ या समाधान नहीं हुआ है।
